डॉ. अंबेडकर का नारीवादी दृष्टिकोण: पितृसत्ता से कानूनी स्वतंत्रता तक का सफर
DOI:
https://doi.org/10.71366/ijwos03022608483Keywords:
बीज शब्द : पितृसत्ता, लैंगिक समानता, महिला अधिकार, सामाजिक न्याय, विधिक सशक्तिकरण, शिक्षा का अधिकार.
Abstract
भारतीय समाज में नारी की स्थिति सदियों से सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक संरचनाओं द्वारा नियंत्रित रही है, जिसमें पितृसत्ता ने एक केंद्रीय भूमिका निभाई है। इस व्यवस्था के अंतर्गत महिलाओं को प्रायः परिवार और समाज में द्वितीयक स्थान दिया गया, जहाँ उनकी स्वतंत्रता, शिक्षा, संपत्ति के अधिकार और निर्णय लेने की क्षमता सीमित कर दी गई। नारी को ‘अधीन’, ‘निर्भर’ और ‘संरक्षित’ के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिससे उसकी स्वतंत्र पहचान और व्यक्तित्व का विकास बाधित हुआ। यद्यपि आधुनिक युग में नारीवाद के विभिन्न आयामों पर चर्चा होती है, किन्तु भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस विमर्श की जड़ें केवल पश्चिमी विचारधारा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह देश के अपने सामाजिक-सांस्कृतिक संघर्षों से भी गहराई से जुड़ी हुई हैं। इसी संदर्भ में डॉ. भीमराव अंबेडकर का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और विशिष्ट है। अंबेडकर ने न केवल जाति-व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष किया, बल्कि उन्होंने महिलाओं की दयनीय स्थिति को भी सामाजिक अन्याय का एक प्रमुख अंग माना। उनके विचारों में नारी मुक्ति केवल सामाजिक सुधार का विषय नहीं थी, बल्कि यह एक व्यापक सामाजिक क्रांति का अनिवार्य हिस्सा थी। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि जब तक महिलाओं को समान अधिकार, सम्मान और अवसर प्राप्त नहीं होंगे, तब तक किसी भी समाज को वास्तव में प्रगतिशील नहीं कहा जा सकता। डॉ. अंबेडकर का नारीवादी दृष्टिकोण मूलतः समानता, न्याय और स्वतंत्रता के सिद्धांतों पर आधारित था। उन्होंने यह समझा कि पितृसत्ता केवल एक सामाजिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह एक वैचारिक संरचना है, जो धर्म, परंपरा और कानून के माध्यम से महिलाओं के दमन को वैधता प्रदान करती है। इसलिए उन्होंने इस व्यवस्था को चुनौती देने के लिए कानूनी और संवैधानिक उपायों को आवश्यक माना। भारतीय संविधान के निर्माण में उनकी निर्णायक भूमिका के माध्यम से उन्होंने महिलाओं को समान नागरिक अधिकार, मतदान का अधिकार, और विधिक संरक्षण प्रदान करने की दिशा में ऐतिहासिक कार्य किया।
विशेष रूप से, हिंदू कोड बिल के माध्यम से उन्होंने विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और संपत्ति के अधिकारों में महिलाओं को समानता दिलाने का प्रयास किया। यद्यपि उस समय इस विधेयक का व्यापक विरोध हुआ, फिर भी यह भारतीय नारी के अधिकारों के इतिहास में एक क्रांतिकारी पहल थी। अंबेडकर का यह दृष्टिकोण इस बात को रेखांकित करता है कि वास्तविक नारी मुक्ति केवल सामाजिक जागरूकता से नहीं, बल्कि ठोस कानूनी अधिकारों और संरचनात्मक परिवर्तन से संभव है। इस प्रकार, डॉ. अंबेडकर का नारीवादी चिंतन भारतीय समाज में पितृसत्ता के विरुद्ध एक सशक्त वैचारिक और व्यावहारिक हस्तक्षेप के रूप में सामने आता है। उन्होंने नारी को ‘वस्तु’ या ‘परनिर्भर’ इकाई के रूप में नहीं, बल्कि एक पूर्ण ‘स्वतंत्र नागरिक’ के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया। यह अध्ययन इसी दृष्टिकोण को समझने और विश्लेषित करने का प्रयास है, जिसमें यह देखा जाएगा कि किस प्रकार अंबेडकर ने पितृसत्तात्मक संरचनाओं को चुनौती देते हुए महिलाओं को कानूनी और सामाजिक स्वतंत्रता की दिशा में अग्रसर किया।1
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