रीतिकालीन कविता में नायक-चेतना और आदर्श नायक का स्वरूप
DOI:
https://doi.org/10.71366/ijwosKeywords:
बीज शब्द : नायक-चेतना, आदर्श नायक, श्रृंगार-रस, सौंदर्य-बोध, दरबारी संस्कृति, कलाप्रेम, कला और संगीत, प्रेम और श्रृंगार।
Abstract
रीतिकाल (1600–1850 ई.) हिंदी साहित्य का वह समृद्ध एवं उत्कर्षपूर्ण अध्याय है जिसमें काव्य-रचना का केंद्रबिंदु मानवीय जीवन का लौकिक सौंदर्य, श्रृंगारिक अनुभव, प्रेम-संवेदना और कलात्मक अभिव्यक्ति बन जाता है। यह वह कालखंड है जिसमें काव्य केवल भावनाओं का माध्यम नहीं, बल्कि सौंदर्यशास्त्रीय संरचना, कलात्मक शैली, अलंकृत भाषा और रस–सिद्धांतों का प्रयोग-क्षेत्र बनकर उभरता है। भक्तिकाल जहाँ ईश्वर–भक्ति, साधना, भक्ति-माधुर्य और आध्यात्मिक समर्पण पर आधारित था, वहीं रीतिकाल का साहित्य देह-प्रधान प्रेम, रसमय जीवन-दर्शन, लौकिक सौंदर्य और मानवीय संबंधों की अनुभूतियों को केंद्र में रखता है। रीतिकाल में राजाश्रय प्राप्त कवियों की परंपरा अत्यंत सशक्त रही, जिसके फलस्वरूप काव्य-सृजन दरबारी संस्कृति से प्रभावित हुआ। दरबारों में संगीत, नृत्य, कला, विलासिता, श्रृंगार और भव्यता का प्रभाव साहित्य में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। इस काव्य परंपरा में नायक–नायिका, श्रृंगार-रस, अलंकार, नायिका-भेद, रति-व्यवहार, समय-संयोग और वियोग-स्थितियाँ, प्रेम के संकेत एवं नख-शिख वर्णन जैसे उपादानों ने सौंदर्य का अत्यंत उच्च स्तर निर्मित किया।1
इसी काव्य-परंपरा में नायक-चेतना एक केंद्रीय स्थान ग्रहण करती है। रीतिकालीन कविता का नायक केवल प्रेम-नायक ही नहीं होता, बल्कि वह एक आदर्श व्यक्तित्व, सांस्कृतिक जीवन-मूल्यों का प्रतिनिधि, सामाजिक गरिमा और राजसी वैभव का प्रतीक बनकर उपस्थित होता है। वह सौंदर्य, प्रेम, शौर्य, प्रतिष्ठा और मर्यादा जैसे गुणों का समन्वय है। उसके व्यक्तित्व का लक्ष्य केवल प्रेम-साधना या नायिका-प्राप्ति नहीं, बल्कि रसमय जीवन के कलात्मक अनुभवों का आनंद है। रीतिकाल का नायक भावनात्मक रूप से अत्यंत संवेदनशील, कलाप्रिय और श्रृंगार-मर्मज्ञ है। वह प्रकृति, स्त्री-सौंदर्य, कला, प्रेम और सामाजिक आदर्शों के समन्वय से निर्मित व्यक्तित्व है। इस प्रकार रीतिकाल में नायक-चेतना केवल साहित्यिक अवधारणा नहीं, बल्कि समकालीन समाज और संस्कृति का जीवंत दस्तावेज प्रस्तुत करती है। अतः रीतिकालीन काव्य में नायक का स्वरूप केवल अलंकारिक और मौलिक कृति के रूप में नहीं अपितु सामाजिक और सौंदर्यात्मक आदर्श की मूर्ति बनकर उभरता है। इस नायक के माध्यम से उस समय के सामंती समाज, राजदरबारों, सांस्कृतिक प्रसंगों और मानव-जीवन की लौकिक संवेदनाओं का सशक्त अभिव्यक्ति-रूप दिखाई देता है। यही कारण है कि रीतिकालीन साहित्य के अध्ययन में नायक-चेतना और आदर्श नायक का स्वरूप अत्यंत महत्त्वपूर्ण और शोधयोग्य विषय है, क्योंकि इसके माध्यम से न केवल काव्य-रचना की विशिष्टता ज्ञात होती है, बल्कि उस दौर के सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश और कला-दृष्टि का भी गहन परिचय मिलता है।2
Downloads
Published
Issue
Section
License

This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial 4.0 International License.


