गुप्तोत्तर काल और हर्ष युग की संस्कृति: निरंतरता एवं परिवर्तन
DOI:
https://doi.org/10.71366/ijwosKeywords:
बीजशब्द: गुप्त साम्राज्य, हर्षवर्धन, सामंतवाद एवं भूमि-अनुदान प्रथा, धार्मिक सहिष्णुता , संस्कृत साहित्य एवं शिक्षा केंद्र
Abstract
भारतीय इतिहास में गुप्त काल को प्रायः “स्वर्ण युग” की संज्ञा दी जाती है, क्योंकि इस काल में राजनीतिक स्थिरता, प्रशासनिक दक्षता तथा कला, साहित्य, विज्ञान और धर्म के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई; किंतु गुप्त साम्राज्य के पतन के पश्चात आरंभ हुए गुप्तोत्तर काल को लंबे समय तक इतिहासलेखन में सांस्कृतिक अवनति और राजनीतिक अराजकता का युग मान लिया गया, जिससे यह धारणा बनी कि गुप्त काल के साथ ही भारतीय सभ्यता की रचनात्मक शक्ति क्षीण हो गई, जबकि आधुनिक ऐतिहासिक अनुसंधान, पुरातात्त्विक खोजें और समकालीन साहित्यिक स्रोत इस दृष्टिकोण का खंडन करते हैं और यह स्पष्ट करते हैं कि गुप्तोत्तर काल भारतीय संस्कृति के पतन का नहीं, बल्कि संक्रमण, पुनर्गठन और नवीन अभिव्यक्तियों का काल था; इस युग में केंद्रीय सत्ता के कमजोर होने के बावजूद क्षेत्रीय शासकों, सामंतों तथा धार्मिक संस्थाओं के संरक्षण में सांस्कृतिक गतिविधियाँ निरंतर सक्रिय रहीं, जिसके परिणामस्वरूप मंदिर स्थापत्य, मूर्तिकला, चित्रकला, साहित्य और धार्मिक विचारधाराओं में नए रूपों और शैलियों का विकास हुआ, साथ ही ब्राह्मण धर्म के साथ-साथ बौद्ध और जैन परंपराओं की सृजनात्मक निरंतरता भी बनी रही; इसी सांस्कृतिक प्रवाह की पराकाष्ठा सातवीं शताब्दी में हर्षवर्धन के शासनकाल में देखने को मिलती है, जब राजनीतिक एकीकरण के प्रयासों के साथ सांस्कृतिक जीवन को अभूतपूर्व प्रोत्साहन मिला, स्वयं हर्ष का साहित्यिक योगदान, धर्मों के प्रति सहिष्णु दृष्टिकोण, शिक्षा केंद्रों का उत्कर्ष तथा विदेशी यात्रियों के विवरण इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि गुप्तोत्तर काल और हर्ष युग भारतीय सांस्कृतिक इतिहास में अवनति के नहीं, बल्कि निरंतरता और परिवर्तन के सशक्त और गतिशील चरण हैं।
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