भारत–दक्षिण एशिया संबंधों का औपनिवेशिक आयाम का विश्लेषण

Authors

  • रश्मि कुमारी शोधार्थी, वि. वि. इतिहास विभाग
    Author
  • डॉ. मुकेश कुमार ,
    Author

DOI:

https://doi.org/10.71366/ijwos03082645823

Keywords:

औपनिवेशिक विरासत, उत्तर-औपनिवेशिक भू-राजनीति, सीमा विवाद, साम्राज्यवादी नीतियां, क्षेत्रीय आधिपत्य।

Abstract

भारत-दक्षिण एशिया संबंधों के औपनिवेशिक आयाम का विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि इस क्षेत्र की समकालीन भू-राजनीति, सीमा विवाद, सुरक्षा चुनौतियाँ और अंतर-राज्यीय अविश्वास वास्तव में ब्रिटिश साम्राज्यवादी नीतियों की दीर्घकालिक संरचनात्मक देन हैं। औपनिवेशिक शासन के दौरान ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश क्राउन ने पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को एक एकीकृत आर्थिक व सामरिक बाजार के रूप में संचालित किया, परंतु अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए 'बांटो और राज करो' की नीति, नस्लीय विभाजन तथा धार्मिक-जातीय ध्रुवीकरण को बढ़ावा दिया। स्वतंत्रता के समय बिना किसी व्यापक जनसहमति या भौगोलिक यथार्थ का ध्यान रखे खींची गई मनमानी औपनिवेशिक सीमाओं - जैसे डूरंड रेखा और रेडक्लिफ रेखा ने उपमहाद्वीप की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक निरंतरता को रातों-रात विखंडित कर दिया। इसके परिणामस्वरूप, उत्तर-औपनिवेशिक काल में भारत और उसके पड़ोसियों (जैसे पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका व अफगानिस्तान) के बीच सीमा विवाद, शरणार्थी संकट, अल्पसंख्यकों के अधिकार और नदी जल बंटवारे जैसी जटिल चुनौतियाँ उत्पन्न हुईं। स्वतंत्रता के बाद भारत ने ब्रिटिश राज से एक केंद्रीकृत सुरक्षा-उन्मुख दृष्टि और विशाल भौगोलिक स्थिति विरासत में प्राप्त की, जिससे पड़ोसी देशों में अक्सर भारत के 'बड़े भाई' वाले प्रभुत्व की आशंकाएँ उपजीं, जबकि भारत इन ढांचों के माध्यम से क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना चाहता था। वर्तमान परिदृश्य में, जहाँ अन्य बाह्य शक्तियाँ दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव बढ़ा रही हैं, भारत अपने साझा औपनिवेशिक इतिहास, सांस्कृतिक जुड़ाव और औपनिवेशिक काल की एकीकृत अवसंरचनात्मक प्राथमिकताओं को 'पड़ोस प्रथम' नीति, क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास पहल तथा क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण का आधार बनाने का प्रयास कर रहा है। निष्कर्षतः, यह अध्ययन रेखांकित करता है कि दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग की विफलता और सफलता को समझने के लिए औपनिवेशिक विरासत का आलोचनात्मक पुनर्मूल्यांकन और औपनिवेशिक मानसिकता का वि-औपनिवेशीकरण अत्यंत आवश्यक है।

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Published

2026-08-12

How to Cite

[1]
रश्मि कुमारी , “भारत–दक्षिण एशिया संबंधों का औपनिवेशिक आयाम का विश्लेषण”, Int. J. Web Multidiscip. Stud. pp. 190-198, 2026-08-12 doi: https://doi.org/10.71366/ijwos03082645823 .